कविता

  • २९ फाल्गुन २०७८, आईतवार ०१:२८ मा प्रकाशित
  • कविता
    चली गोचा संगे परगा बर्हाइ

    गोचा टुँ ओ मै
    मुस्कान के बियाँ छिट्के
    रात दिन पस्ना चुहाके
    हिमालसे गोचाली भिंरके
    पहारसे मित जोरके
    तराईके फँटुवामे
    चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

    जल स्रोतके खानी हिमालमे बा
    खनिज पदार्थके स्रोत पहारमे बा
    औद्योगिक स्रोत तराईके मैदानमे बा
    अत्रा रटिरटि चिमचाम काहे
    चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

    बार्होमास बहना लडियामेसे
    बिजली निकारी
    चारकोसे हरियर बनुवँमसे
    जरिबुटी दवाइ बनाइ
    समथर तराईक् फँटुवामे
    पस्ना चुहाके सोन फराइ
    चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

    प्रकृतिसे जोरल हमार भविष्य सिंगारी
    गेंडा, मखमल, डौना, बेबरी
    फुलक् टेंम्ह्रीहस सजाके
    फरछुवार बनाइ जिन्गीक डगर
    चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

    टोहाँर ओ मोर हाँठ गोरा खियाके
    मेहनतके पस्ना चुहाके
    आउ संघारी संगे सहकार्य करि
    हिमालहस ढेंग सपना बनाके
    चली गोचा संगे परगा बर्हाइ ।

    परिश्रमके डिया बारके
    कन्ढम् हाँठ ढारके
    जोन्हियाँहस ओजरार छिटिक्के
    टोरैंयाँहस चम्कटी रहि हर दिन
    ओ ओठ भर मुस्की भरटी रहि
    टुँ हिमाली, टुँ पहारी, मै तराई
    चलि गोचा संगे परगा बर्हाइ ।
    सागर कुश्मी `संगत´
    कैलारी गाउँपालिका-८ डख्खिन टेंर्ही, कैलाली

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